लखनऊ अग्निकांड हाईकोर्ट: 20 साल का अतिक्रमण कैसे हुआ?
राजधानी में हुए भीषण अग्निकांड के बाद मामला अब न्यायपालिका तक पहुंच चुका है। लखनऊ अग्निकांड हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान प्रशासनिक लापरवाही और सरकारी जमीन पर लंबे समय से चले आ रहे अतिक्रमण को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने विकासनगर में जली झुग्गियों के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए प्रशासन से विस्तृत जवाब मांगा है। अदालत ने इस पूरे मामले को जनहित से जुड़ा गंभीर विषय बताते हुए संबंधित अधिकारियों को 30 मई तक शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
कोर्ट के सबसे बड़े सवाल
लखनऊ अग्निकांड हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार से पूछा कि आखिर कैसे लगभग 20 वर्षों तक PWD की जमीन पर 1455 लोग अतिक्रमण कर बस गए और प्रशासन को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई।
कोर्ट ने विशेष रूप से इन बिंदुओं पर जवाब मांगा:
- सरकारी जमीन पर इतनी बड़ी बस्ती कैसे बस गई?
- बिजली और गैस कनेक्शन किन कंपनियों ने दिए?
- क्या प्रशासन को अतिक्रमण की जानकारी थी?
- अगर जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
राहत कार्य पर हाईकोर्ट सख्त
लखनऊ अग्निकांड हाईकोर्ट ने राहत कार्यों को लेकर भी सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि पीड़ित परिवारों को तुरंत:
- भोजन
- रहने की व्यवस्था
- चिकित्सा सुविधा
उपलब्ध कराई जाए।
PWD और राहत आयुक्त को भी मामले में पक्षकार बनाया गया है।
जांच के संकेत
सुनवाई के दौरान लखनऊ अग्निकांड हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि पूरे मामले की जांच कराई जा सकती है। साथ ही अधिकारियों को चेतावनी दी गई कि भविष्य में किसी भी सरकारी जमीन पर अतिक्रमण न होने दिया जाए।
15 अप्रैल का भीषण हादसा
15 अप्रैल की शाम विकासनगर में लगी आग ने पूरे शहर को हिला दिया। शाम करीब 5:30 बजे लगी आग तेजी से फैल गई।
- 30 से ज्यादा सिलेंडर फटे
- 250 से अधिक झोपड़ियां जलकर राख
- 10 किमी दूर तक धुआं दिखाई दिया
फायर ब्रिगेड की 20 गाड़ियों ने 5 घंटे बाद आग पर काबू पाया।
नेताओं ने लिया जायजा
घटना के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीएम से जानकारी ली और डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक मौके पर पहुंचे।
मासूमों की मौत और मुआवजा
अग्निकांड के अगले दिन मलबे से दो बच्चियों के शव मिले। सरकार ने मृतकों के परिवार को 4-4 लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा की है।
निष्कर्ष
अब लखनऊ अग्निकांड हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर सभी की नजर है। यह मामला प्रशासनिक जिम्मेदारी, अतिक्रमण और पीड़ितों के पुनर्वास से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है।


